लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. जे.एन. मिश्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि संशोधित तकनीक के माध्यम से केलोइड्स (अनियमित रेशेदार ऊतक) का सफल उपचार संभव है। उन्होंने कहा कि इस नई विधि से दवा को गहरे ऊतकों तक पहुँचाने में सहायता मिलती है और भविष्य की उन्नत तकनीकों के साथ समान परिस्थितियों में इसका उपयोग किया जा सकता है।
प्रो. मिश्रा के अनुसार, आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुरूप किसी भी तकनीक को अपनाने से पहले उसे पढ़ना, समझना और अनुभव के आधार पर लागू करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि उनका वर्तमान शोध कार्य बिना चाकू के ट्यूमर उन्मूलन पर केंद्रित है। आयुर्वेद में पुनरावृत्ति वाले ट्यूमर को “अर्बुद” कहा गया है, और उनके शोध का उद्देश्य पुनरावृत्ति से जुड़ी बाधाओं को दूर कर पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करना है।
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तकनीक की कार्यप्रणाली
इस विधि में दबाव-प्रवणता तकनीक के तहत केलोइड्स को समाप्त करने के लिए ट्यूमर पर बंधन आधारित प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें संचारक पदार्थ युक्त धागे के स्थान पर “स्लिप लूज नॉट” तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिससे पूरी प्रक्रिया में एक ही धागे का लगातार उपयोग संभव हो सके।
प्रभावित भाग को पहले साबुन और पानी से साफ किया जाता है। बंधन के लिए 0.5 मिमी का नरम सूती धागा प्रयोग किया जाता है, जिसका कोर कठोर और बाहरी भाग मुलायम एवं कुशनयुक्त होता है, ताकि ऊतक को क्षति न पहुँचे।
संपीड़न प्रवणता का मूल्यांकन दर्द के अनुभव के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक तीसरे दिन दबाव को न्यूनतम सीमा तक बढ़ाया जाता है, जो कम से कम 20 मिमी एचजी तक बनाए रखा जाता है।
प्रो. मिश्रा ने इस तकनीक की सफलता दर्शाते हुए चार केस रिपोर्ट प्रस्तुत कीं।
- पहला केस: स्वयं पर इस विधि का प्रयोग; 21 दिनों में केलोइड समाप्त, पुनरावृत्ति नहीं।
- दूसरा केस: 28 वर्षीय पुरुष का सफल उपचार।
- तीसरा केस: 60 वर्षीय महिला के दाहिने घुटने पर केलोइड का सफल उपचार।
- चौथा केस: 32 वर्षीय पुरुष के दाहिने कान के नीचे केलोइड का उपचार; अब तक पुनरावृत्ति नहीं।
प्रो. मिश्रा ने दावा किया कि यह तकनीक केलोइड्स के उपचार में प्रभावी सिद्ध हो रही है और पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
NAGARIK SATTA