अखिलेश पाण्डेय,
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा में बुधवार को जनप्रतिनिधियों के फोन न उठाए जाने के मामले में विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने अपना निर्णय सुनाते हुए अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि जनहित के मामलों में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा अस्वीकार्य है। यह मामला नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय तथा समाजवादी पार्टी की सदस्य रागिनी सोनकर द्वारा उठाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि जिलों में अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन नहीं उठा रहे हैं, जिससे जनहित के कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
निर्णय सुनाते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 164 का उल्लेख किया और कहा कि मंत्रिपरिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। ऐसे में यदि जनहित के कार्यों के लिए अधिकारी से संपर्क किया जाता है, तो यह उनका दायित्व है कि वे संबंधित जनप्रतिनिधि को अपेक्षित सम्मान और समय दें तथा उनकी बात सुनें। अध्यक्ष ने संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना द्वारा दिए गए तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि पूर्व में सदन के अधिकारों की अवहेलना के मामले में कुछ अधिकारियों को दंडित भी किया जा चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी दंडात्मक स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए प्रशासन को सजग रहना होगा।
सतीश महाना ने कहा कि अधिकारियों का वर्तमान आचरण संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। जनहित के कार्यों के लिए संपर्क करने वाले सदन के सदस्यों को समुचित सम्मान देना अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। यदि विशेषाधिकार हनन या अवमानना की स्थिति उत्पन्न होती है तो सदन को कार्रवाई करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ दशकों से विधायिका की गरिमा और उसकी संवैधानिक भूमिका के निर्वहन में सुगम वातावरण का अभाव देखा जा रहा है। साथ ही न्यायपालिका के कुछ आदेशों के अनुपालन में भी ढिलाई के उदाहरण सामने आए हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने संसदीय कार्य मंत्री से अनुरोध किया कि शासन स्तर पर जो निर्णय लिए जा चुके हैं, उनका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए। उन्होंने कहा कि शासनादेशों का पालन न करना सेवा नियमावली का उल्लंघन है। यदि विधायकों के संदर्भ में जारी आदेशों का पालन अधिकारियों द्वारा नहीं किया जाता है, तो नियमानुसार कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
NAGARIK SATTA