
लखनऊ। हिंदी फिल्म संगीत के विस्तृत इतिहास में अनेक ऐसे गायक हुए हैं जिन्होंने बहुत कम गीत गाए, परंतु अपनी विशिष्ट आवाज़ के कारण श्रोताओं के मन में अमिट छाप छोड़ दी। ऐसे ही प्रतिभाशाली किंतु अपेक्षाकृत अल्प-परिचित गायक थे चंद्रशेखर गाडगिल। उनका जन्म 1947 में पुणे में हुआ और 2 अक्टूबर 2014 को मुंबई में हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। वे मराठी और हिंदी सिनेमा के प्रतिभाशाली पार्श्वगायक थे, जिन्होंने अपनी विशिष्ट गायकी से सीमित अवसरों में भी पहचान बनाई।
चंद्रशेखर गाडगिल ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा किराना घराने के सुप्रसिद्ध गुरु सदाशिव बुवा जाधव से प्राप्त की। प्रारंभिक दौर में उन्होंने ऑर्केस्ट्रा गायक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। गणेशोत्सव और नवरात्रि जैसे उत्सवों में वे नियमित रूप से मंचीय प्रस्तुतियाँ देते थे। वे विशेष रूप से मन्ना डे का प्रसिद्ध गीत “लागा चुनरी में दाग” गाया करते थे, जिससे उन्हें व्यापक सराहना मिली। आगे चलकर उन्होंने गायिका रश्मि के साथ ‘रश्मि ऑर्केस्ट्रा’ की स्थापना की तथा ‘मेलोडी मेकर्स’ नामक समूह में मुख्य गायक के रूप में कार्य किया।
एक कार्यक्रम में उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर संगीतकार राम कदम ने उन्हें फिल्म में गाने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने वी. शांताराम की मराठी फिल्म ‘झुंज’ में उषा मंगेशकर के साथ युगल गीत गाए। मराठी सिनेमा में सफलता के बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया।
वर्ष 1981 में कुदरत में, जिसका निर्देशन राज एन. सिप्पी ने किया था, उन्होंने “दुख सुख की हर एक माला, कुदरत ही पिरोती है” जैसे भावपूर्ण गीत को स्वर दिया। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। इसके पश्चात 1982 में अशांति में, जिसका निर्देशन एफ. सी. मेहरा ने किया, उन्हें पुनः अवसर मिला। इस बहु-कलाकार फिल्म के संगीतकार आर. डी. बर्मन थे। “शक्ति दे माँ” गीत ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।
यद्यपि इन गीतों से उन्हें लोकप्रियता मिली, परंतु बाद में फिल्मी जगत में उन्हें अपेक्षित अवसर नहीं मिल सके। इसके पश्चात उन्होंने भजन-संगीत की ओर रुख किया और जीवन के अंतिम समय तक भक्ति-संगीत का गायन करते रहे। उन्होंने ‘शापित गंधर्व’ नामक पुस्तक भी लिखी। सीमित फिल्मी अवसरों के बावजूद चंद्रशेखर गाडगिल का योगदान भारतीय संगीत जगत में सादर स्मरणीय है।
NAGARIK SATTA