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त्रिवेणी कला संगम नाट्य उत्सव: संवेदनाओं और सामाजिक विमर्श का सशक्त मंचन

नई दिल्ली, ब्यूरो। त्रिवेणी कला संगम में आयोजित तीन दिवसीय नाट्य उत्सव के दूसरे दिन रंगमंच ने एक बार फिर समाज के जटिल सवालों को मंच पर जीवंत कर दिया। दिन भर चली प्रस्तुतियों में दो ऐसे नाटकों का मंचन हुआ, जिन्होंने दर्शकों को न केवल बांधे रखा, बल्कि उन्हें गहन आत्ममंथन के लिए भी विवश किया।

दूसरे दिन की शुरुआत राजीव मिश्रा द्वारा लिखित और रोहित त्रिपाठी द्वारा निर्देशित नाटक ‘फायर प्लेस’ से हुई। यह नाटक कश्मीर से कश्मीरी हिंदुओं के पलायन और मुस्लिम कट्टरवाद के बीच उपजी त्रासदीपूर्ण कश्मकश को प्रभावशाली ढंग से सामने लाता है। 1947 के बाद से लेकर 1990 के दशक में पनपे आतंकवाद की पृष्ठभूमि में ‘कश्मीरियत’ के बिखरते स्वरूप और मानवीय मूल्यों के संघर्ष को नाटक ने मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया। संवेदनशील कथानक और सशक्त मंचन ने दर्शकों को गहराई तक प्रभावित किया।

इसके बाद प्रस्तुत किया गया प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष का बहुचर्चित नाटक ‘फंदी’, जिसका निर्देशन आर.एस. विकल ने किया। यह नाटक इच्छामृत्यु (मर्सी किलिंग) जैसे जटिल और संवेदनशील विषय को वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखता है। ‘फंदी’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़े नैतिक द्वंद्वों पर गंभीर बहस की पहल है, जो दर्शकों के अंतर्मन को झकझोर देती है।

नाटक का केंद्रीय पात्र ‘फंदी’ एक साधारण ट्रक ड्राइवर है, जो अपने पिता को अंतिम अवस्था के कैंसर की असहनीय पीड़ा में तड़पते देख मानसिक रूप से टूट जाता है। जब पिता बार-बार मृत्यु की याचना करते हैं, तब यह स्थिति नाटक के केंद्र में एक गहरे नैतिक संघर्ष को जन्म देती है। इसी के इर्द-गिर्द संवेदना, कर्तव्य, अपराध और न्याय जैसे प्रश्न आकार लेते हैं।

इस प्रस्तुति में सीआर सुरेश, आरव वत्स, अरविंद कुमार, प्रेम प्रजापति, आशीष चौधरी और सायरा अली ने अपने प्रभावशाली अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया और दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।

इस अवसर पर जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता विजय प्रताप, एआईसीसी के संचार विभाग के मीडिया सचिव संजीव कुमार सिंह, संस्कार भारती के श्री शर्मा और श्री त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी उपस्थित रहे। सभी अतिथियों को गुरु सपन आचार्य एवं संस्था की ओर से रिजवान रज़ा ने अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के अंत में सभी कलाकारों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।

नाट्य उत्सव के दूसरे दिन की प्रस्तुतियों ने यह साबित कर दिया कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के आईने के रूप में विचार और संवेदना को जगाने की एक सशक्त विधा है।

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