- स्क्रीन से पन्नों की ओर : किताबों की दुनिया में लौटते कदम
- प्रयागराज में राज्य स्तरीय पठन संस्कृति महोत्सव ने दिया पढ़ने की आदत को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश
प्रयागराज। सुबह की शुरुआत मोबाइल स्क्रीन से और रात का आखिरी वक्त भी स्क्रीन के साथ आज की डिजिटल दिनचर्या में किताब के पन्नों के लिए समय निकालना चुनौती बनता जा रहा है। खासकर बच्चों और किशोरों के जीवन में मोबाइल फोन सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन की बढ़ती मौजूदगी ने पढ़ने की पारंपरिक आदत को प्रभावित किया है। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से उठी एक पहल ने किताबों की ओर लौटने का संदेश दिया है।
शिक्षा निदेशालय उत्तर प्रदेश प्रयागराज के सिविल लाइन्स परिसर में आयोजित राज्य स्तरीय पठन संस्कृति महोत्सव स्क्रीन से पन्नों की ओर ने इस सवाल को केंद्र में रखा कि तकनीक की तेज रफ्तार के बीच क्या हम पढ़ने के लिए अपना समय बचा पा रहे हैं? पुस्तकालय प्रकोष्ठ माध्यमिक शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश शासन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पुस्तकों के प्रति रुचि जगाना नहीं बल्कि विद्यार्थियों और समाज में पठन को जीवनशैली का हिस्सा बनाने की संस्कृति विकसित करना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अपर मुख्य सचिव, माध्यमिक एवं बेसिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा ने अपने संबोधन में पठन संस्कृति की जरूरत को सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज के स्क्रीन युग में बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है। उनका संदेश स्पष्ट था बच्चे केवल अंकों के लिए न पढ़ें, बल्कि आनंद के लिए भी पढ़ें। उन्होंने कहा कि हर घर और हर विद्यालय में किताबों के लिए एक स्थान होना चाहिए और हर दिन पढ़ने के लिए एक निश्चित समय भी निर्धारित किया जाना चाहिए। यह सुझाव केवल पुस्तकालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ने को घर और विद्यालय की दैनिक संस्कृति में शामिल करने का आह्वान है। दरअसल, किताब पढ़ना केवल परीक्षा की तैयारी नहीं है। यह बच्चे को सवाल पूछना सिखाता है, उसकी कल्पना को उड़ान देता है और उसे अपने आसपास की दुनिया को नए नजरिए से देखने की क्षमता प्रदान करता है। पुस्तकों से जुड़ाव ज्ञान के साथ-साथ चिंतन, कल्पनाशक्ति और व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया को भी मजबूत करता है।
- मोबाइल के दौर में किताब की चुनौती
आज सूचना का संसार हमारी हथेली में है। कुछ सेकंड में समाचार, वीडियो, मनोरंजन और दुनिया भर की जानकारी सामने आ जाती है। लेकिन सुविधा के इस विस्तार के साथ एक दूसरी चुनौती भी सामने आई है क्या त्वरित सूचना गहन पठन का विकल्प हो सकती है? स्क्रीन से पन्नों की ओर महोत्सव इसी सवाल पर विचार करने का अवसर बना। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से होने वाली समस्याओं को लघु नाटिका के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। मंच पर दिखाई गई स्थितियों ने यह संदेश दिया कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है लेकिन उसका अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग पढ़ने, सोचने और संवाद करने की आदतों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जरूरत स्क्रीन छोड़ने की नहीं, बल्कि स्क्रीन और किताब के बीच संतुलन बनाने की है।
महोत्सव का एक महत्वपूर्ण पड़ाव शिक्षा निदेशालय परिसर में स्थित सार्वजनिक पुस्तकालय का आमजन के लिए शुभारंभ रहा। अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने पुस्तकालय का उद्घाटन किया और पुस्तक प्रदर्शनी का अवलोकन किया। सार्वजनिक पुस्तकालय केवल किताबों को रखने का स्थान नहीं होता। वह समाज के अलग-अलग वर्गों को ज्ञान से जोड़ने वाला साझा मंच होता है। ऐसे समय में जब पढ़ने की आदत डिजिटल माध्यमों के दबाव में बदल रही है, पुस्तकालयों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। पुस्तकालय विद्यार्थियों को शांत वातावरण में पढ़ने, नए विषयों को जानने और अपनी रुचि के साहित्य से जुड़ने का अवसर देते हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए महोत्सव ने पुस्तकालय को ज्ञान और पठन संस्कृति के केंद्र के रूप में रेखांकित किया।
कार्यक्रम को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा गया। तीन सत्रों में आयोजित गतिविधियों ने पठन संस्कृति के विभिन्न आयामों को सामने रखा। पहले सत्र में सामान्य ज्ञान क्विज आयोजित हुई, जिसका संचालन महेश चंद्र देवा ने किया। विद्यार्थियों के लिए यह गतिविधि ज्ञान को रोचक और संवादात्मक तरीके से समझने का अवसर बनी। इसके बाद मिथिलेश लखनवी ने देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भावपूर्ण बनाया। दूसरे सत्र में समाचार-पत्र पढ़ने की उपयोगिता पर चर्चा हुई। समाचार पत्र केवल खबरों का माध्यम नहीं बल्कि भाषा सामान्य ज्ञान समसामयिक घटनाओं और सामाजिक सरोकारों को समझने का महत्वपूर्ण साधन हैं। विद्यार्थियों में समाचार-पठन की आदत उन्हें अपने समय और समाज से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। तीसरा सत्र साहित्य और संवाद को समर्पित रहा। लेखक से संवाद कार्यक्रम में अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा और लेखिका प्रो. नीलम शरण गौर के बीच संवाद हुआ। इसका संचालन चंद्र प्रकाश ने किया। इस संवाद ने साहित्य को केवल किताब के पन्नों तक सीमित न रखकर उसे विचार अनुभव और जीवन से जोड़ने का अवसर दिया।
महोत्सव में सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया। इसके साथ ही उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों और पुस्तकालय अध्यक्षों को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए। यह सम्मान इस बात का संकेत भी है कि पठन संस्कृति का निर्माण केवल विद्यार्थियों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए शिक्षक, पुस्तकालयाध्यक्ष, अभिभावक और पूरा शैक्षणिक वातावरण समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन, कोलकाता के पूर्व महानिदेशक केके बनर्जी को भी सम्मानित किया गया।
‘स्क्रीन से पन्नों की ओर’ महोत्सव का महत्व केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य उस आदत को जन्म देना है जो कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी बनी रहे। यदि हर घर में किताबों के लिए एक छोटी-सी जगह बने, यदि हर विद्यालय में प्रतिदिन कुछ समय केवल पढ़ने के लिए निर्धारित हो और यदि बच्चे पढ़ने को परीक्षा के दबाव के बजाय आनंद के रूप में स्वीकार करें, तो पठन संस्कृति एक अभियान से आगे बढ़कर सामाजिक आदत बन सकती है। आज आवश्यकता बच्चों से मोबाइल छीन लेने की नहीं, बल्कि उन्हें किताब उठाने का आनंद समझाने की है। तकनीक के साथ आगे बढ़ते हुए किताबों से रिश्ता बनाए रखना ही उस संतुलित समाज की नींव हो सकता है, जहां सूचना के साथ समझ, ज्ञान के साथ विवेक और स्क्रीन के साथ संवेदना भी मौजूद हो। प्रयागराज का यह महोत्सव इसी उम्मीद का संदेश लेकर सामने आया स्क्रीन की चमक अपनी जगह है, लेकिन किताब के पन्नों में छिपी दुनिया आज भी उतनी ही जीवंत है। जरूरत केवल उस दुनिया का दरवाजा फिर से खोलने की है।
NAGARIK SATTA