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लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थानः जहां हर आंकड़े के पीछे एक धड़कता जीवन है

 

✍️ प्रणय विक्रम सिंह : लखनऊ

अस्पताल शायद उन गिनी चुनी कुछ जगहों में से एक है जहां मनुष्य जीवन की सबसे कठिन घड़ी में भी उम्मीद लेकर पहुंचता है। चेहरे पर चिंता होती है, मन में अनगिनत आशंकाएं लेकिन इन सबसे ऊपर एक विश्वास होता है कि यहां से उसका अपना स्वस्थ होकर घर लौटेगा। चिकित्सा विज्ञान की सारी प्रगति अंततः इसी विश्वास को बचाए रखने की कोशिश है। लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान का षष्ठम स्थापना दिवस इसी कोशिश, इसी सेवा और इसी विश्वास की यात्रा को देखने का अवसर है। छह वर्षों में संस्थान ने केवल सुविधाओं का विस्तार नहीं किया, बल्कि चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान की तीनों धाराओं को साथ लेकर उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में अपनी भूमिका को लगातार व्यापक बनाया है।

आंकड़ों को देखें तो पिछले वर्ष 2025-26 में 9.31 लाख से अधिक रोगियों ने यहां ओपीडी सेवाओं का लाभ लिया और लगभग 79 हजार रोगी भर्ती हुए। वर्ष 2025 में 1.70 लाख से अधिक मरीज इमरजेंसी पहुंचे। इसी अवधि में 27 लाख से अधिक प्रयोगशाला और 7.46 लाख रेडियोलॉजी जांचें हुईं। 39 हजार से अधिक शल्य चिकित्साएं की गईं और 6,995 प्रसव कराए गए। ये संख्याएं बड़ी हैं, लेकिन इनका वास्तविक अर्थ संख्याओं के भीतर है। 39 हजार ऑपरेशन यानी ऑपरेशन थिएटर के बाहर हजारों परिवारों की बेचौन प्रतीक्षा। लगभग सात हजार प्रसव यानी उतने ही घरों में गूंजी जीवन की पहली किलकारी। और इमरजेंसी में पहुंचे हर गंभीर रोगी के साथ किसी परिजन की वह व्याकुल पुकार ‘डॉक्टर साहब, जल्दी देख लीजिए‘। अस्पताल में इसलिए केवल रोगी नहीं आते उनके साथ रिश्ते, चिंताएं और प्रार्थनाएं भी आती हैं। कहीं सांस बचाई गई, कहीं सांस ने पहली बार संसार को छुआ। यही अस्पताल है। जीवन की चिंता और जीवन के उत्सव के बीच लगातार बहती हुई एक धारा।

बीमारी केवल शरीर को नहीं तोड़ती। कई बार वह घर की आर्थिक कमर भी तोड़ देती है। ऐसे किसी परिवार की कल्पना कीजिए जिसे डॉक्टर बता दे कि इलाज लंबा और महंगा है। अगले ही क्षण बीमारी से अधिक बड़ा प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है कि इतने पैसे आएंगे कहां से? यहीं डबल इंजन सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। ऐसे में गत वर्ष संस्थान द्वारा आयुष्मान भारत के अंतर्गत 21,615 लाभार्थियों को ₹122.11 करोड़ तथा दीनदयाल उपाध्याय योजना के अंतर्गत 973 लाभार्थियों को ₹16.66 करोड़ मूल्य की निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराना आंकड़ों से कहीं बड़ी कहानी कहता है।

इन करोड़ों रुपयों का सबसे सुंदर हिसाब उस पिता की आंखों में मिलेगा जिसे बेटे के उपचार के लिए जमीन नहीं बेचनी पड़ी। उस मां के चेहरे पर मिलेगा जिसे बीमारी और गरीबी में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ा। उसके लिए यह केवल मुफ्त इलाज नहीं है, यह संकट के समय व्यवस्था का भरोसा है कि ‘आप इलाज कराइए, सरकार आपके साथ है‘। यही किसी भी लोक कल्याणकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मानवीय रूप है।

इसी मानवीय भाव को संस्थान के ’मुख्य चिकित्सा अधीक्षक’ डॉ. विक्रम सिंह रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘हमारे लिए प्रतिदिन आने वाले हजारों मरीज केवल संख्या नहीं, अपने परिवारों की उम्मीद हैं। उन्हें समय पर बेहतर उपचार के साथ संवेदनशील व्यवहार मिले और वे स्वास्थ्य लाभ व विश्वास लेकर लौटें, यही हमारी प्राथमिकता है‘।

इस बढ़ती जिम्मेदारी को संभालने के लिए मानव संसाधन भी मजबूत हुआ है। गत वर्ष 165 नियमित संकाय सदस्यों, 665 नर्सिंग अधिकारियों और 334 आउटसोर्स कर्मियों की नियुक्ति की गई। करीब ₹250 करोड़ के चिकित्सा उपकरणों की खरीद के आदेश जारी हुए और हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड के माध्यम से ₹213.99 करोड़ की औषधियां वितरित की गईं। क्योंकि अस्पताल केवल मशीनों से नहीं चलता। वेंटिलेटर के साथ प्रशिक्षित हाथ चाहिए, मॉनिटर के साथ सजग आंखें और उपचार के साथ आत्मीय व्यवहार भी। मशीन चिकित्सा की क्षमता बढ़ाती है, मनुष्य उसे संवेदना देता है।

लोहिया संस्थान की यात्रा वर्तमान के रोगियों तक सीमित नहीं है। इसके कक्षों और गलियारों में भविष्य के चिकित्सक भी तैयार हो रहे हैं। प्रतिवर्ष 200 एमबीबीएस विद्यार्थियों के साथ एमडी, एमएस, डीएम, एमसीएच, नर्सिंग, न्यूक्लियर मेडिसिन और पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में नई पीढ़ी चिकित्सा का ज्ञान और कौशल अर्जित कर रही है। आज किसी वरिष्ठ चिकित्सक के पीछे खड़ा होकर रोगी को देख रहा विद्यार्थी शायद कुछ वर्षों बाद स्वयं किसी परिवार के सामने खड़ा होकर कहेगा कि ‘घबराइए मत, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं‘। यही चिकित्सा शिक्षा की वास्तविक विरासत है।

इसी साधना का अगला सोपान शोध है। वर्ष 2025-26 में 148 अनुसंधान परियोजनाएं और 20 क्लिनिकल ट्रायल प्रारंभ हुए। एमबीबीएस विद्यार्थियों ने आठ शोध परियोजनाएं शुरू कीं, स्नातकोत्तर विद्यार्थियों ने 90 थीसिस पर काम प्रारंभ किया और 35 पीएचडी शोधार्थियों का चयन हुआ। संस्थान के नाम तीन पेटेंट भी हैं। विभिन्न विभागों ने 71 कॉन्फ्रेंस, वर्कशॉप और सीएमई आयोजित किए, जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 3 डी प्रिंटिंग और इंडियन नॉलेज सिस्टम जैसे भविष्यपरक विषय भी शामिल रहे। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज प्रयोगशाला में पूछा गया एक प्रश्न कल किसी रोगी के जीवन का उत्तर बन सकता है।

अब संस्थान की यात्रा चिकित्सा तकनीक के एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। न्यूरोसाइंस सेंटर की स्थापना के बाद न्यूरो रोगियों के लिए उपलब्ध बेड की संख्या लगभग 150 हो गई है। जल्द ही यहां उत्तर प्रदेश की पहली गामा नाइफ स्थापित होगी। यह अत्याधुनिक तकनीक मस्तिष्क के ट्यूमर और चुनिंदा न्यूरोलॉजिकल रोगों के अत्यंत सटीक उपचार की नई संभावना खोलेगी। इस उपलब्धि का वास्तविक अर्थ मशीन की कीमत में नहीं, उस दूरी में है जो मरीज और आधुनिक उपचार के बीच कम होगी।

शहीद पथ परिसर में 100 शैय्या का क्रिटिकल केयर सेंटर भी निर्माणाधीन है। इसी परिसर में ₹855.04 करोड़ की लागत से 1,010 बेड का नया अत्याधुनिक चिकित्सालय आकार लेगा, जिसमें 10 मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, इमरजेंसी आईसीयू और मरीज तथा तीमारदार की सुविधा को ध्यान में रखकर आधुनिक व्यवस्थाएं विकसित की जाएंगी। कागज पर यह 1010 बेड की परियोजना है। किन्तु किसी जरूरतमंद परिवार की भाषा में इसका अर्थ है बेहतर इलाज की संभावना और सुलभता का विस्तार।

विद्यार्थियों के लिए भी भविष्य का परिसर तैयार हो रहा है। लगभग ₹174 करोड़ की लागत से 888 बेड के छात्रावास और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का निर्माण प्रक्रियाधीन है। नर्सिंग एवं पैरामेडिकल शिक्षा के लिए शहीद पथ परिसर में ₹52.93 करोड़ का शैक्षणिक भवन बन रहा है, जबकि अकादमिक भवन में लगभग ₹10 करोड़ की लागत से मल्टीपर्पस हॉल तैयार हो चुका है।

इस बढ़ते विस्तार के बीच संस्थान के ’निदेशक डॉ सीएम सिंह’ की दृष्टि अब आगे की जिम्मेदारियों पर है। वे कहते हैं ‘षष्ठम स्थापना दिवस उपलब्धियों के साथ हमारी जिम्मेदारियों को भी बढ़ाता है। नई तकनीक और बढ़ती चिकित्सा सुविधाओं के बीच हमारा प्रयास यही है कि लोहिया संस्थान आने वाले प्रत्येक रोगी को उत्कृष्ट उपचार और भरोसा दे तथा शिक्षा एवं शोध का भी अग्रणी केंद्र बने‘।

लेकिन इस पूरे विस्तार की सार्थकता अंततः उस व्यक्ति से तय होगी, जिसके लिए ये सारी व्यवस्थाएं खड़ी की जा रही हैं। यही विकास का मानवीय अर्थ है। इमारत बढ़े तो उम्मीद के लिए जगह बढ़े, मशीन बढ़े तो उपचार की संभावना बढ़े, डॉक्टर बढ़ें तो रोगी की प्रतीक्षा घटे और शोध बढ़े तो बीमारी की हार की संभावना बढ़े। तकनीक अत्याधुनिक हो, लेकिन उपचार आत्मीय रहे। मशीन रोग को पहचान सकती है, रोगी का डर नहीं। मॉनिटर धड़कन बता सकता है, लेकिन उस धड़कन से जुड़े रिश्तों की कीमत नहीं।

डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम से जुड़े इस संस्थान के लिए इसीलिए जिम्मेदारी और गहरी है कि उत्कृष्ट चिकित्सा उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, जिसकी बीमारी बड़ी है लेकिन साधन छोटे हैं। विज्ञान की ऊंचाई और संवेदना की गहराई जितनी साथ बढ़ेंगी, चिकित्सा उतनी ही सार्थक होगी। षष्ठम स्थापना दिवस पर उपलब्धियों का उत्सव अवश्य हो, लेकिन सबसे अधिक अभिनंदन उस विश्वास का होना चाहिए जो वर्षों में यहां बना है। उस डॉक्टर का जो ऑपरेशन थिएटर से बाहर आकर प्रतीक्षा करते परिवार से कहता है ‘चिंता मत कीजिए, ऑपरेशन सफल रहा‘। उस नर्स का जिसकी आवाज रात के सन्नाटे में किसी मरीज को भरोसा देती है। उस शोधार्थी का जो प्रयोगशाला में किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर खोज रहा है, जिसका समाधान कल किसी अनजान व्यक्ति का जीवन बचा सकता है। और उस पूरी व्यवस्था का जो प्रतिदिन हजारों लोगों के दर्द, डर और उम्मीद के बीच खड़ी रहती है।

आने वाले वर्षों में लोहिया संस्थान का आकार और बढ़ेगा। नए भवन बनेंगे, नए बेड जुड़ेंगे, गामा नाइफ जैसी तकनीक आएगी और शोध के नए रास्ते खुलेंगे। लेकिन इन सबकी सबसे बड़ी सार्थकता तब होगी, जब यहां आने वाला व्यक्ति दर्द लेकर आए और राहत लेकर लौटे, डर लेकर आए और भरोसा लेकर लौटे, निराशा लेकर आए और उम्मीद लेकर लौटे। क्योंकि किसी अस्पताल की सफलता उसकी सबसे ऊंची इमारत या सबसे महंगी मशीन में नहीं लिखी जाती। वह उस घर की मुस्कान में लिखी जाती है, जिसका अपना कोई व्यक्ति स्वस्थ होकर घर वापस लौटता है।

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