- एड लीडरशिप-2026 में शिक्षा की नई पद्धतियों पर मंथन, एआई युग के अनुरूप विद्यालयों को तैयार करने पर जोर
लखनऊ। शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनमें निहित प्रतिभा, रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन और मानवीय मूल्यों को विकसित करना है। इसके लिए शिक्षण पद्धतियों में सकारात्मक बदलाव लाने और विद्यार्थियों को सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाने की आवश्यकता है। यह विचार सिटी मॉन्टेसरी स्कूल (सीएमएस) की संस्थापिका-निदेशिका डॉ. भारती गांधी ने कानपुर रोड स्थित सीएमएस ऑडिटोरियम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘एड लीडरशिप-2026’ के दौरान व्यक्त किए।
ग्लोबल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के तत्वावधान में ‘रीडिजाइनिंग स्कूल्स फॉर द एआई एरा’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में देशभर से आए 1,000 से अधिक शिक्षकों, प्रधानाचार्यों और शिक्षाविदों ने शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव, आधुनिक शिक्षण पद्धतियों तथा भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विद्यालयों के विकास पर विचार-विमर्श किया। सम्मेलन के दूसरे दिन कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
शिक्षकों को संबोधित करते हुए डॉ. भारती गांधी ने कहा कि विद्यालय घर का ही विस्तार है और शिक्षक बच्चों के लिए दूसरी मां के समान होते हैं। इसलिए शिक्षकों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। बच्चों में रचनात्मकता, सहयोग की भावना, संवाद कौशल, आलोचनात्मक चिंतन और चारित्रिक उत्कृष्टता विकसित करने के साथ ही उन्हें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना जरूरी है, ताकि वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक और ‘ग्रीन वॉरियर्स’ के रूप में समाज में योगदान दे सकें।
सम्मेलन की संयोजिका, ग्लोबल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट एवं देवी संस्थान की संस्थापिका डॉ. सुनीता गांधी ने शिक्षकों और प्रधानाचार्यों का स्वागत करते हुए कहा कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम है। बदलते समय में ऐसी शिक्षण व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें बच्चे केवल शिक्षक की बात सुनने वाले निष्क्रिय श्रोता न रहें, बल्कि स्वयं खोजने, समझने, प्रश्न पूछने और अनुभवों के माध्यम से सीखने वाले सक्रिय शिक्षार्थी बनें।
उन्होंने गतिविधि-आधारित और परियोजना-आधारित शिक्षण को समय की आवश्यकता बताते हुए सहपाठी शिक्षण, जोड़ी में सीखने और विविधताओं के सम्मान पर जोर दिया। डॉ. सुनीता गांधी के अनुसार, ‘अल्फा लर्निंग पेडागॉजी’ के ये महत्वपूर्ण आधार विद्यार्थियों में सहयोग, सहभागिता और पारस्परिक समझ विकसित करते हैं। इस तरह की शिक्षण प्रक्रिया बच्चों को व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और वैश्विक नागरिक के रूप में तैयार होने में सहायता करती है।
- सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने पर परिचर्चा
सम्मेलन में ‘पुट लर्निंग ऑन ट्रायल’ विषय पर आयोजित राउंडटेबल परिचर्चा विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इसका संचालन सीएमएस जॉपलिंग रोड कैंपस की हेडमिस्ट्रेस सोनाली चौधरी ने किया। परिचर्चा में शामिल शिक्षाविदों ने विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता बढ़ाने, कक्षा में संवाद को प्रभावी बनाने और शिक्षकों की भूमिका को अधिक सहयोगात्मक बनाने जैसे विषयों पर अपने विचार साझा किए।
प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. शारदा गुप्ता ने कहा कि कक्षा में होने वाली प्रत्येक चर्चा और गतिविधि का स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए, ताकि विद्यार्थी उससे सार्थक सीख प्राप्त कर सकें। एम्परसैंड ग्रुप की निदेशक डॉ. रीता सोनावत ने कहा कि बच्चों को अपनी गलतियों को पहचानने और उनमें सुधार करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। इससे उनमें आत्मनिर्भरता और स्वयं सीखने की क्षमता विकसित होती है।
सीएमएस शालीमार वनवर्ल्ड की प्रधानाचार्या प्रियंका अग्रवाल ने ‘अल्फा’ पद्धति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसमें अलग-अलग सीखने की क्षमताओं वाले बच्चे एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। इससे उन्हें एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और सामूहिक रूप से समस्याओं का समाधान खोजने का अवसर मिलता है। वहीं, सीएमएस गोमती नगर प्रथम कैंपस की प्रधानाचार्या सोमा चंद्रा ने विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से सीखने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई।
सीएमएस जानकीपुरम की प्रधानाचार्या डॉ. रचना गोयल ने सहपाठी शिक्षण और जोड़ी में सीखने के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में दोनों विद्यार्थियों को सीखने और अपनी समझ को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है। परिचर्चा में इस बात पर भी सहमति बनी कि गृहकार्य को केवल लिखित अभ्यास तक सीमित नहीं रखना चाहिए। विद्यार्थियों को साक्षात्कार लेने, पौधे लगाने और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से भी सीखने के अवसर दिए जा सकते हैं। इससे शिक्षा को वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ने में मदद मिलती है।
- अनुभवों के आदान-प्रदान से मिली नई दृष्टि
सम्मेलन के दौरान ग्लोबल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की सदस्या सबा मिर्जा के संयोजन में एक रोचक एवं ज्ञानवर्धक प्रस्तुति भी आयोजित की गई। इसमें 11 शिक्षकों ने जापानी शिक्षकों की वेशभूषा में भाग लेते हुए ‘अल्फा क्लासरूम’ से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। इस प्रस्तुति के माध्यम से शिक्षण के विभिन्न तरीकों, कक्षा में विद्यार्थियों की भागीदारी और प्रभावी अधिगम के अनुभवों को सामने रखा गया।
- एआई युग में बदलती शिक्षा की भूमिका
‘एड लीडरशिप-2026’ में हुई चर्चाओं ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच विद्यालयों को केवल तकनीकी बदलावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में ऐसी पद्धतियों को महत्व देना होगा, जो विद्यार्थियों को स्वतंत्र चिंतन, रचनात्मकता, सहयोग और जिम्मेदारी के साथ नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करें। इसमें शिक्षकों की भूमिका ज्ञान देने वाले व्यक्ति से आगे बढ़कर मार्गदर्शक और सीखने की प्रक्रिया को सुगम बनाने वाले सहयोगी की हो जाती है।
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 10 अक्टूबर को पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह के साथ संपन्न होगा। इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले देश-विदेश के प्रख्यात शिक्षाविदों को सम्मानित किया जाएगा। सम्मेलन का उद्देश्य आधुनिक शिक्षण पद्धतियों के माध्यम से विद्यालयी शिक्षा को अधिक प्रभावी, रचनात्मक और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने की दिशा में संवाद को आगे बढ़ाना है।
NAGARIK SATTA

