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भाषा विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “समकालीन समाज, साहित्य और विचार में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता‘ का समापन
लखनऊ। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ में अंग्रेज़ी एवं एमईएएल विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “समकालीन समाज, साहित्य और विचार में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता‘ का शनिवार को सफलतापूर्वक समापन हो गया। देशभर से लगभग 140 शोध-पत्र प्राप्त हुए, जिनमें से अनेक शोध-पत्र दोनों दिनों में आयोजित तकनीकी सत्रों में प्रस्तुत किए गए।
समापन सत्र को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने भारतीय ज्ञान की अवधारणा को परिभाषित करते हुए कहा कि वह सूचना, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होकर समाज को दिशा दे, वही वास्तविक ज्ञान है। उन्होंने कहा कि भारत ने सदा से नैतिकता, सत्य, करुणा और मानवीय मूल्यों को ज्ञान का आधार माना है तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली इन्हीं मूल्यों की संवाहक है।
इस अवसर पर विशेष व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए प्रो. हुमा याक़ूब ने सतत विकास, पर्यावरण-संरक्षण और मदर आर्थ की रक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भावना बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय मूल्य संतुलन, संयम और प्रकृति-सम्मान वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकटों को समझने का वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पश्चिम के अनेक विद्वान योग, आयुर्वेद, आध्यात्मिक दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरणा लेते रहे हैं, जिससे प्ज्ञै आज वैश्विक अकादमिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुका है।
संगोष्ठी के संरक्षक प्रो. सैयद हैदर अली, अधिष्ठाता वाणिज्य संकाय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि छम्च् भारतीय ज्ञान प्रणाली को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती है, जो विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना, आत्मगौरव और वैज्ञानिक दृष्टि को समान रूप से विकसित करती है।
दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. अब्बास अली महदी, कुलपति इरा विश्वविद्यालय ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक वैज्ञानिक और सामाजिक चुनौतियों के समाधान के लिए प्रासंगिक बताया। मुख्य वक्ता रहे प्रो. ओएन उपाध्याय लखनऊ विश्वविद्यालय ने आईकेएस की समग्रता को आधुनिक समाज के लिए आवश्यक बताया, जबकि विशिष्ट अतिथि प्रो. पवन अग्रवाल (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने इसके भाषा वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक आयामों पर प्रकाश डाला।
प्रथम व द्वितीय तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः प्रो. आरपी सिंह, प्रो. रश्मि अत्रे, प्रो. एसजी पुरी और प्रो. समीना खान ने की। दोनों दिनों के सत्रों में शोधकर्ताओं ने साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, समाज, भाषा और दार्शनिक दृष्टियों के आधार पर भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयाम प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ रुचिता सुजय चौधरी, ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी द्वारा की गई। संगोष्ठी का औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव संयोजक डॉ. हारून रशीद ने प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी को सफल बनाने में डॉ शिप्रा, डॉ शिखा, श्री यूसुफ़ एवं सुमन की अहम भूमिका रही। कार्यक्रम में डॉ. दुआ, डॉ. नीरज शुक्ला, डॉ. ज़ैबुन, डॉ. पियूष, डॉ. मुर्तज़ा अली अथर, डॉ विभा और डॉ. अंशुल सहित सभी शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। यह आयोजन भारतीय ज्ञान प्रणाली की समकालीन प्रासंगिकता, उसके वैश्विक प्रभाव तथा उसके अंतर्विषयी स्वरूप को रेखांकित करने में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
NAGARIK SATTA
