लखनऊ। संत गाडगे महाराज के परिनिर्माण दिवस के अवसर पर चारबाग बस स्टेशन परिसर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कर्मचारी नेता रूपेश कुमार ने संत गाडगे महाराज के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। उनके साथ मो. रिजवान, मो. अशरफ, विवेक मिश्रा, अनुज कुमार तिवारी, सै. रियाज अली, विवेक सिंह, पवन यादव सहित चारबाग डिपो के अधिकारी एवं कर्मचारियों ने भी पुष्पांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कर्मचारी नेता रूपेश कुमार ने संत गाडगे महाराज के जीवन और विचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संत गाडगे महाराज का जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेंण गांव में एक किसान धोबी परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम डेबू जी झिंगरा जी जाणओरकर था। उनके पिता झिंगरा जी की शराब की लत के कारण असमय मृत्यु हो गई, जिसके बाद वे अपनी माता सखूबाई के साथ ननिहाल दापुरे गांव चले गए। वहां उन्होंने बचपन से ही खेती और मेहनत का जीवन जिया।
रूपेश कुमार ने कहा कि उस समय समाज में जाति-व्यवस्था, छुआछूत और भेदभाव अपने चरम पर था। शूद्रों और अति-शूद्रों को सार्वजनिक स्थानों और जलस्रोतों से दूर रखा जाता था। इन अमानवीय परिस्थितियों को गाडगे बाबा ने स्वयं अनुभव किया, जिससे उनके मन में सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का संकल्प जागा। इसी उद्देश्य से उन्होंने गृह त्याग कर समाज सुधार का मार्ग अपनाया।
उन्होंने बताया कि गाडगे बाबा ने अपने जीवन के लगभग 50 वर्षों तक स्वच्छता को अपना मिशन बनाया। वे जहां भी जाते, सबसे पहले झाड़ू लगाकर सफाई करते थे। उनका यह अभियान पूरे महाराष्ट्र में प्रसिद्ध हुआ। उनके योगदान को सम्मान देते हुए महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2001 में ‘संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान’ की शुरुआत की।
रूपेश कुमार ने कहा कि संत गाडगे महाराज एक त्यागी, लोभ-रहित और मानव सेवा को ईश्वर सेवा मानने वाले संत थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 54 संस्थाओं की स्थापना की और फरवरी 1952 में गाडगे महाराज मिशन की स्थापना की, जो इन संस्थाओं का संचालन करता है। उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को ट्रस्ट में स्थान नहीं दिया और न ही किसी प्रकार का आर्थिक लाभ लिया।
कार्यक्रम में बताया गया कि गाडगे बाबा सामाजिक सुधार के कार्यों में इतने समर्पित थे कि वे अपनी माता और पुत्र के निधन पर भी उपस्थित नहीं हुए। मधुमेह रोग से पीड़ित गाडगे बाबा ने 20 दिसंबर 1956 को अमरावती जाते समय पेढ़ी नदी के पुल पर अंतिम सांस ली।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी लोगों ने संत गाडगे महाराज के विचारों को अपनाने और स्वच्छता, समानता एवं मानव सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
NAGARIK SATTA