
लखनऊ। सत्तर के दशक की स्मृतियाँ आज भी भारतीय जनमानस में जीवित हैं, जब क्रिकेट के मैदान में सलीम दुर्रानी दर्शकों की आवाज़ पर छक्का जड़ दिया करते थे। तालियों की गूंज, नाम की गूंज और सफलता का उजास, सब कुछ उनके इर्द-गिर्द था। पर समय, जो कभी किसी का स्थायी साथी नहीं रहा, धीरे-धीरे करवट बदलता गया। जिस खिलाड़ी ने देश का मान बढ़ाया, वही जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक तंगी और उपेक्षा का बोझ ढोता रहा। आज उनकी पत्नी रेखा श्रीवास्तव की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें उनका जर्जर और फटेहाल स्वरूप हमें भीतर तक विचलित कर देता है।
यह पीड़ा केवल सलीम दुर्रानी तक सीमित नहीं है। कभी भारतीय क्रिकेट की उम्मीद कहे जाने वाले विनोद कांबली की असहज स्थिति भी हमारे सामने रही है। प्रतिभा, यश और शोहरत जब साथ छोड़ देते हैं, तो अकेला मनुष्य समाज की संवेदनहीनता से जूझता नजर आता है। कुछ समय पूर्व अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणा पंडित का गरीबी और एकाकीपन में दुनिया से विदा होना भी इसी विडंबना का एक मार्मिक उदाहरण है।
फिल्मी दुनिया में भी ऐसी अनेक कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं। कभी परदे पर चमकने वाली मीना कुमारी का अंतिम जीवन बीमारी और तन्हाई में बीता। भगवान दादा, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी, अंतिम दिनों में गुमनामी और अभावों से घिरे रहे। राज किरण जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता का मानसिक संघर्ष और गुमशुदगी आज भी सवाल बनकर खड़ी है। खेल और सिनेमा ही नहीं, साहित्य जगत भी समय की इस क्रूरता से अछूता नहीं रहा।
प्रख्यात शायर और गीतकार हसरत जयपुरी ने अपने अंतिम दिनों में गरीबी का दर्द शब्दों में यूँ ढाला था:-
“वक्त का ऐतबार न कीजिए,
ये तो बेवफ़ा तवायफ है,
कल मेरी थी, आज किसी और की है।”
वास्तव में, वक्त का स्वभाव ही परिवर्तन है। वह न यश को स्थायी बनाता है, न वैभव को। आज जो शिखर पर है, वह कल ढलान पर भी हो सकता है। इसलिए जीवन की सबसे बड़ी सीख यही है कि वर्तमान की चकाचौंध में भविष्य की तैयारी न भूलें। आत्मसम्मान, संयम, बचत और मानवीय संबंध यही वे पूंजी हैं जो कठिन समय में संबल बनती हैं। क्योंकि अंततः, समय सबका इम्तिहान लेता है और सजग वही रहता है, जो आने वाले कल के लिए आज ही सजग हो जाता है।
NAGARIK SATTA