लखनऊ। रामकृष्ण मठ, लखनऊ में शनिवार को आयोजित प्रातःकालीन सत्संग में मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने श्री रामकृष्ण परमहंस के वचनों के आधार पर अवतार के स्वरूप, उनकी पहचान और मनुष्य की सीमित बुद्धि पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार को समझना साधारण मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन है, क्योंकि वे बाहर से सामान्य मनुष्य की तरह दिखाई देते हैं, जबकि वास्तव में वे अनंत और विराट परमात्मा के स्वरूप होते हैं।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि अधिकांश लोग भगवान के वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाते, क्योंकि मनुष्य का अहंकार सत्य को देखने में सबसे बड़ी बाधा बनता है। जब तक व्यक्ति अपने ज्ञान, बुद्धि और अहंकार की सीमाओं में बंधा रहता है, तब तक वह ईश्वर के दिव्य स्वरूप को स्वीकार नहीं कर सकता। अहंकार समाप्त होने पर ही हृदय में विनम्रता आती है और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का अनुभव संभव हो पाता है।
उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद के पूर्व रूप नरेंद्रनाथ तथा महेंद्रलाल सरकार भी प्रारंभिक समय में श्री रामकृष्ण परमहंस के विराट आध्यात्मिक स्वरूप को पूरी तरह नहीं समझ सके थे। इससे स्पष्ट होता है कि महान बुद्धिजीवी भी केवल तर्क के आधार पर ईश्वर को नहीं समझ सकते, बल्कि इसके लिए आंतरिक शुद्धता और आध्यात्मिक अनुभव आवश्यक है।
स्वामीजी ने कहा कि रामचरितमानस के कागभुशुण्डि प्रसंग में भी यही शिक्षा मिलती है कि जब तक जीव में अहंकार विद्यमान रहता है, तब तक वह भगवान के अवतार को पहचान नहीं सकता। शरणागति, विनम्रता और अहंकार का नाश ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि जब ईश्वर मानव रूप धारण करते हैं तो वे सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करते हुए अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं। उनका यह व्यवहार बाहरी दृष्टि से सामान्य प्रतीत होता है, लेकिन उसके पीछे गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य निहित रहता है।
सत्संग के अंत में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मनुष्य की समझ और बुद्धि सीमित है, जबकि परमात्मा असीम और अनंत हैं। इसलिए ईश्वर को केवल तर्क और बौद्धिक मापदंडों से समझने का प्रयास अधूरा रहेगा। श्रद्धा, भक्ति, विनम्रता और आत्मसमर्पण का मार्ग ही मनुष्य को सत्य, शांति और ईश्वर की अनुभूति तक पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर को उनके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करना ही सच्ची साधना है और अहंकार का त्याग ही आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खोलता है।
NAGARIK SATTA