- चार दिवसीय ध्यान शिविर में देश-विदेश के करीब 250 साधक-साधिकाएं होंगे शामिल
लखनऊ। राजधानी में गुरुवार, एक अक्टूबर से चार दिवसीय ओशो गीता ध्यान यज्ञ शुरू होगा। दिव्य प्रेम ध्यान साधना फाउंडेशन की ओर से कानपुर रोड स्थित आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसार्ट में आयोजित इस ध्यान शिविर में देश-विदेश से करीब 250 साधक-साधिकाएं शामिल होंगे।
शिविर में साधक ओशो के उन चुनिंदा अमृत वचनों और प्रवचनों का लाभ उठाएंगे, जिनमें उन्होंने भगवद्गीता के 18 अध्यायों की गहन व्याख्या की थी। ओशो ने वर्ष 1970 से 1975 के बीच पांच वर्षों की अवधि में गीता पर विस्तार से अपने विचार रखे थे।
ध्यान यज्ञ की मुख्य आयोजिका दिव्य ज्योति ने बताया कि शिविर का संचालन देश-विदेश के प्रख्यात ओशो संन्यासियों द्वारा किया जा रहा है। इनमें हरियाणा से ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती, गुरु मां अमृता प्रिया, मां मंजुषा, नेपाल से मां अनामिका, दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर और महाराष्ट्र से स्वामी दिगंबर शामिल हैं। साधकों से साधना के दौरान सहजता के लिए सफेद या मैरून रंग के ढीले वस्त्र पहनकर आने का अनुरोध किया गया है।
शिविर में मां अमृता प्रिया ने कहा कि गीता केवल बौद्धिक अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने का मार्ग है। हजारों वर्षों से लोग गीता का अध्ययन और चिंतन करते आ रहे हैं, लेकिन उसके बताए मार्ग पर चलना ही वास्तविक साधना है।
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने गीता के 13वें अध्याय की व्याख्या करते हुए कहा कि गीता मनुष्य को आत्मा और शरीर के भेद को समझाती है। शरीर क्षेत्र है और उसे जानने वाली आत्मा क्षेत्रज्ञ है।
मां अनामिका ने कहा कि ओशो ने ध्यान में डूबने की अनूठी कला सिखाई है। हंसते, नाचते और गाते हुए भी बिना गंभीरता, त्याग और तपस्या के परमात्मा को जाना जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रभु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व में गूंजता हुआ अनाहत नाद है। गीता में भगवान ने अर्जुन को जानने योग्य पवित्र ओंकार के बारे में बताया है। इस ध्यान यज्ञ में साधक उसी ओंकार के अनुभव की दिशा में साधना करेंगे।
शिविर में दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर तथा मध्य प्रदेश से मां मंजुषा और स्वामी दिगंबर ने भी अपने विचार रखे।
NAGARIK SATTA