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मायावती का योगी सरकार की तारीफ करना, क्या होगा सियासी मायने?
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दलित-पिछड़ा वोट बैंक पर भाजपा-सपा के बीच कड़ी टक्कर
अभिषेक रंजन स्वतंत्र पत्रकार
लखनऊ। यूपी में लंबे समय बाद बसपा प्रमुख मायावती ने इतनी बड़ी रैली की है जिसमें लाखों बसपाईयों ने बहन जी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। इस आस्था को देखकर सपा, कांग्रेस की चिंता लाजिम है क्योंकि मायावती ने खुलेतौर पर रैली स्थल को लेकर योगी सरकार को साधुवाद दिया है। ऐसे में यूपी की राजनीति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बसपा जितनी मजबूत होंगी तो क्या सपा का पीडीए उतना कमजोर होगा ? पिछले लोकसभा और विधान सभा के चुनाव परिणामों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बसपा का जनाधार खिसकर सपा की तरफ गया है जिससे बसपा की सीटें कम हुई है। भाजपा तो लंबे समय से दलित-पिछड़ा कार्ड खेल ही है और उसमें सफलता भी प्राप्त कर रही है। परेषानी सपा और बसपा के लिए है कि वह इस वोट बैंक को कितना और कहां तक सहेज पाएंगे?
डप्र में दलित और पिछड़े वोट बैंक की रस्सा कसी बहुत पुरानी है। यह भी सही है कि जिस दल के साथ यह वोट बैंक चल गया उस दल को सत्ता की कुर्सी भी मिली है। भाजपा जो कभी सिर्फ सवर्णों की पार्टी कही जाती थी उसने भी अपनी रणनीति बदली और उप्र में सवका साथ सबका विकास के मंत्र पर यू टर्न लिया जिससे भाजपा को 2014, 2017, 2019, 2022, 2024 में जमकर सीटें मिली है। यह बात अलग है कि क्रिकेट की तरह भले ही मैच में कभी रन रेट कम रहा हो लेकिन जीत लगातार सुनिष्चित की है। बसपा की रैली में अपरोक्ष रूप से यदि सत्तारूढ़ दल बीजेपी ने किसी प्रकार का सहयोग भी किया होगा तो इसे स्वच्छ राजनीति के रूप में लिया जाना चाहिए।
मायावती की रैली का मुख्य लक्ष्य दलित वोटों को वापस अपनी ओर खींचना था। 2024 के लोकसभा चुनावों में, सपा के पीडीए फार्मूले ने दलित और मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई थी। इस रैली के जरिए मायावती ने उन मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि बसपा ही उनकी एकमात्र असली प्रतिनिधि है।
रैली में मायावती ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब सपा सत्ता में होती है तो उसे दलित संतों और महापुरुषों की याद नहीं आती। मायावती की रैली से दलित वोटों का बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। अगर दलित वोट बसपा और सपा के बीच बंट जाते हैं तो यह भाजपा के लिए चुनावी राह आसान हो जाएगी।
रैली में मायावती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने कांशीराम स्मारक का रखरखाव ठीक से कराया है। इससे भाजपा को दलितों के बीच यह संदेश देने का मौका मिला कि वह भी दलितों के प्रति सम्मान रखती है। भाजपा ने मायावती की तारीफ का स्वागत किया। रैली के बाद, सपा और कांग्रेस ने बसपा को भाजपा की बी टीम कहकर संबोधित किया। बसपा 2012 के बाद से लगातार अपना जनाधार खो रही थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। इस रैली का मुख्य उद्देश्य कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना और खोए हुए वोट बैंक को वापस पाना है। मायावती की रैली से सपा के दलित और मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लग सकती है जिससे सपा को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा को वोटों के बिखराव का फायदा मिल सकता है। रैली में बसपा ने 2027 यूपी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया। मायावती के भाषण में कोई देश-विरोधी या सनातन-विरोधी बयान नहीं था बल्कि विकास, संविधान रक्षा और सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया। भाषण का मुख्य उद्देश्य बसपा की सत्ता में वापसी की छवि बनाना और दलित-बहुजन वोटबैंक को एकजुट करना था।
NAGARIK SATTA