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माघ मेला 2026 का शुभारंभ : माघ मेले में 75 साल बाद दुर्लभ शुभ संयोग

लेखक-: जयशंकर प्रसाद शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार
लेखक-: जयशंकर प्रसाद शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार

यह शब्द “कल्प” (ब्रह्मांडीय समय की एक विशाल अवधि) और “वश” (नियंत्रण या अधीनता) से मिलकर बना है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, एक ‘कल्प’ ब्रह्मा का एक दिन होता है। एक कल्प में 1,000 महायुग होते हैं। एक महायुग में चार युग (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, और कलियुग) होते हैं। कल्पवश का नियम यह बताता है कि सृष्टि की हर वस्तु, यहाँ तक कि देवी-देवता और ग्रह भी, समय (कल्प) के इस चक्र के अधीन हैं। माघ मेले (प्रयागराज) में कल्पवास को आत्मिक शुद्धि और कठिन तपस्या का मार्ग माना जाता है। कल्पवास का अर्थ है—एक निश्चित समय के लिए अपनी सांसारिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर संगम के तट पर निवास करना।

  • आहार संबंधी नियम

  1. एक समय भोजन: कल्पवासी को पूरे दिन में केवल एक बार ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
  2. स्वयं पाक: भोजन स्वयं बनाना अनिवार्य माना जाता है। इसमें फलाहार या निराहार रहने का भी विशेष महत्व है।
  3. सात्विकता: भोजन में लहसुन, प्याज या किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
  • दिनचर्या और स्नान

  1. त्रिवेणी स्नान: प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम में स्नान करना अनिवार्य है।
  2. न्यूनतम सुख-सुविधा: कल्पवासी को जमीन पर सोना (भूमि शयन) चाहिए। गद्दे या पलंग का उपयोग वर्जित है।
  3. सादगी: विलासिता की वस्तुओं, जैसे इत्र, तेल या श्रृंगार का त्याग करना होता है।
  • आध्यात्मिक आचरण

मौन और जप: कल्पवास के दौरान कम से कम बोलना और अधिक से अधिक ईश्वर का ध्यान या मंत्र जप करना चाहिए।
सत्य और अहिंसा: झूठ बोलना, क्रोध करना, निंदा करना या किसी को कष्ट पहुंचाना कल्पवास को खंडित कर सकता है।
ब्रह्मचर्य: इस अवधि में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

  • कल्पवास की अवधि

एक मास का संकल्प: आमतौर पर कल्पवास पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघी पूर्णिमा तक चलता है। कुछ लोग मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक भी इसे करते हैं। तुलसी पूजन: कल्पवासी अपने शिविर के बाहर तुलसी का पौधा लगाते हैं और प्रतिदिन उसकी पूजा करते हैं। पहले स्नान पर्व पर संगम तट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा है।कड़ाके की ठंड में श्रद्धालु एक माह तक डुबकी लगाएंगे। पौराणिक परंपरागत ब्रह्म मुहूर्त में ही श्रद्धालुगण संगम में स्नान करते हैं। माघ मेले में 75 साल बाद दुर्लभ शुभ संयोग है। श्रद्धालु कल्पवास का संकल्प लेकर शुरुआत करते हैं। अनुमानतः 20-25 लाख कल्पवासी एक माह तक प्रवास करेंगे। प्रयागराज में संगम के किनारे माघ मेले में कल्पवास का महत्व है। पौष पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस अनुष्ठान में श्रद्धालु भजन, पूजन और तपस्या में लीन रहते हैं। कल्पवास 12 वर्षों में पूरा होता है और इसके कई नियम हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। पद्म पुराण, अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में इसकी महिमा का वर्णन है। माना जाता है कि इससे जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति। पूर्वजों की तृप्ति व मोक्ष की प्राप्ति। कुछ इन्हीं संकल्पना को साकार करने के लिए तीर्थराज प्रयाग में संगम तीरे माह भर का अखंड तप कल्पवास तीन जनवरी पौष पूर्णिमा से आरंभ हो गया है। भजन, पूजन व अनुष्ठान का क्रम 15 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। गृहस्थ नर-नारी तपस्वियों की भांति माह भर भजन-पूजन में लीन रहेंगे।

  • पुराणों में कल्पवास के 21 नियम बताए गए हैं।

  1. असत्य (झूठ) न बोलना।
  2. हर परिस्थिति में सत्य बोला।
  3. घर-गृहस्थी की चिंता से मुक्त होना।
  4. गंगा में सुबह, दोपहर व शाम को स्नान करना।
  5. शिविर के बाहर तुलसी का बिरवा रोपना व जौ बोना।
  6. तुलसी व जौ को प्रतिदिन जल अर्पित करना।
  7. ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  8. खुद या पत्नी का बनाया सात्विक भोजन करना।
  9. सत्संग में भाग लेना।
  10. इंद्रियों में संयम रखना।
  11. पितरों का पिंडदान करना।
  12. हिंसा से दूर रहना।
  13. विलासिता से दूर रहना।
  14. परनिंदा न करना।
  15. जमीन पर सोना।
  16. भोर में जगना।
  17. किसी भी परिस्थिति में मेला क्षेत्र न छोड़ना।
  18. धार्मिक ग्रंथों व पुस्तकों का पाठ करना।
  19. आपस में धार्मिक चर्चा करना।
  20. प्रतिदिन संतों को भोजन कराकर दक्षिणा देना।
  21. गृहस्थ आश्रम में लौटने के बाद कल्पवास के नियम का पालन करना।
  • 12 वर्ष में पूर्ण होता है कल्पवास

कल्पवास करने वाले लोगों को लगातार 12 वर्ष संगम तीरे आकर भजन-पूजन करना पड़ता है। 12 वर्ष बाद कल्पवास पूर्ण माना जाता है। इसके बाद कल्पवासी सजियादान करते हैं। इसमें तीर्थपुरोहितों को गृहस्थी का समस्त सामान दान किया जाता है।

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