
नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट, ‘योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र में दक्षता प्राप्त करना’ भारत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को अधिक सक्षम, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज़ के रूप में सामने आई है। यह रिपोर्ट न केवल मौजूदा योजनाओं की समीक्षा करती है, बल्कि प्रशासनिक सुधार, डिजिटल एकीकरण और अंतर-मंत्रालयी समन्वय के माध्यम से एमएसएमई सहायता तंत्र को नया आकार देने का प्रयास कर रही है।
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रिपोर्ट की पृष्ठभूमि और आवश्यकता
एमएसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, जो रोजगार सृजन, क्षेत्रीय संतुलन और नवाचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्तमान में एमएसएमई मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों द्वारा संचालित 18 से अधिक योजनाएं ऋण, कौशल, विपणन, प्रौद्योगिकी और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों को कवर करती हैं। हालांकि, इन योजनाओं के समान उद्देश्यों, दोहराव और समन्वय की कमी के कारण संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता। नीति आयोग की रिपोर्ट इसी संरचनात्मक समस्या को रेखांकित करते हुए “अभिसरण” को समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है।
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अभिसरण की अवधारणाः अवसर और सीमाएं
रिपोर्ट में सूचना अभिसरण और प्रक्रिया अभिसरण का दोहरा ढांचा सुझाया गया है। ’सूचना अभिसरण’ के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारों के डेटा को एकीकृत कर नीति-निर्माण को अधिक तथ्यपरक और परिणामोन्मुख बनाने का लक्ष्य रखा गया है। ’प्रक्रिया अभिसरण’ योजनाओं के विलय, समान घटकों के एकीकरण और कार्यान्वयन को सरल बनाने पर केंद्रित है।
यह दृष्टिकोण सैद्धांतिक रूप से प्रभावी प्रतीत होता है, किंतु व्यावहारिक स्तर पर इसके सामने कई चुनौतियां होंगी, जैसे मंत्रालयों के बीच अधिकारों का संतुलन, राज्यों की प्रशासनिक क्षमता और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की जटिलताएं।
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प्रमुख सिफारिशों का समीक्षात्मक मूल्यांकन
- केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल : एआई संचालित एकीकृत पोर्टल का प्रस्ताव एमएसएमई के लिए “वन स्टॉप सॉल्यूशन” की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच जैसी चुनौतियों को हल किए बिना यह पहल सीमित प्रभाव ही डाल पाएगी।
- क्लस्टर विकास योजनाओं का अभिसरण: एसएफयूआरटीआई और एमएसई-सीडीपी का एकीकरण पारंपरिक उद्योगों को नया जीवन दे सकता है। यह कदम पैमाने और दक्षता बढ़ाने में सहायक होगा, बशर्ते शिल्प और पारंपरिक उद्योगों की विशिष्ट आवश्यकताओं को विलय की प्रक्रिया में नजरअंदाज न किया जाए।
- कौशल विकास कार्यक्रमों का समन्वय: तीन-स्तरीय कौशल संरचना व्यावहारिक और समावेशी प्रतीत होती है। फिर भी, विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहेगा।
- विपणन सहायता विंग: घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय विपणन के लिए अलग विंग का प्रस्ताव एमएसएमई को वैश्विक मूल्य श्रृंखला से जोड़ने में सहायक हो सकता है। किंतु इसके लिए निर्यात नियमों, गुणवत्ता मानकों और ब्रांडिंग में व्यावहारिक सहायता अनिवार्य होगी।
- एएसपीआईआरई का एकीकरण: ग्रामीण और कृषि-आधारित उद्यमों को एमएसएमई इनोवेटिव के अंतर्गत लाना सकारात्मक कदम है, पर यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि ग्रामीण उद्यमों की विशिष्ट समस्याएं बड़े नवाचार ढांचे में न दब जाएं।
रिपोर्ट की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह पीएमईजीपी, पीएम विश्वकर्मा और अनुसूचित जाति व जनजाति तथा उत्तर-पूर्व क्षेत्र जैसी लक्षित पहलों की स्वतंत्रता बनाए रखने पर बल देती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नीति आयोग अभिसरण को “पूर्ण विलय” के बजाय “संतुलित एकीकरण” के रूप में देखता है।
NAGARIK SATTA
