लखनऊ। रामकृष्ण मठ लखनऊ में आयोजित रविवारीय साप्ताहिक प्रवचन में मठ के अध्यक्ष ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान है तथा उसका वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर जागरण और आत्मिक उन्नति है।
रामकृष्ण वचनामृत पर प्रवचन करते हुए स्वामीजी ने के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा, “ईश्वर पर जिसका मन है, मनुष्य तो बस वही है।” उन्होंने कहा कि भोजन, निद्रा, भय और प्रजनन जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य और पशु दोनों में समान रूप से पाई जाती हैं, किंतु मनुष्य की विशिष्टता उसकी आध्यात्मिक चेतना, विवेक और ईश्वर को जानने की आकांक्षा में निहित है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि संसार परिवर्तनशील है, जबकि ईश्वर शाश्वत और अपरिवर्तनशील है। धन, प्रतिष्ठा, संबंध और परिस्थितियां समय के साथ बदल जाती हैं, इसलिए मनुष्य को क्षणभंगुर वस्तुओं में स्थायी सुख खोजने के बजाय उस परम सत्य की ओर उन्मुख होना चाहिए, जो नित्य और अविनाशी है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि वह अनंत सत्ता अर्थात ईश्वर का अंश है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को पहचानता है, तब उसके जीवन में आत्मविश्वास, शांति और करुणा का संचार होता है तथा वह भय, अहंकार, लोभ और मोह से ऊपर उठने लगता है।
स्वामीजी ने कहा कि वर्तमान भौतिकवादी युग में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और सुविधाओं को ही सफलता का मापदंड मान बैठा है, जिसके कारण तनाव, असंतोष और मानसिक अशांति बढ़ रही है। ऐसे समय में की शिक्षाएं हमें स्मरण कराती हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक प्रगति नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति भी है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन की सार्थकता ईश्वर के प्रति प्रेम, शाश्वत सत्य की खोज और अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूकता में निहित है। यही श्री रामकृष्ण देव के उपदेशों का मूल संदेश है और यही मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य तक पहुंचाने का मार्ग भी है।
NAGARIK SATTA