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‘साहित्य परिक्रमा’ के नूतन कलेवर का भव्य विमोचन

  • लोकभाषा, लोककला, भारतीय संस्कृति और साहित्य के व्यापक विमर्श को समर्पित पत्रिका अब कई राज्यों से होगी प्रकाशित

लखनऊ। अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास से प्रकाशित प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य परिक्रमा’ के नूतन कलेवर का शनिवार को चेतना डेंटल साहित्यिक केंद्र, आशियाना में भव्य विमोचन हुआ। कार्यक्रम में साहित्यकारों, भाषाविदों, इतिहासकारों, शिक्षाविदों और समाजसेवियों ने पत्रिका के नए स्वरूप तथा भारतीय भाषाओं, लोकभाषाओं, लोककलाओं और संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में उसकी भूमिका पर विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ने की। वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित मुख्य अतिथि रहे। परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल तथा प्रसिद्ध दंत चिकित्सक एवं साहित्यकार डॉ. संजीव अवस्थी विशिष्ट अतिथि रहे। पत्रिका की प्रबंध संपादक प्रो. डॉ. रजनीमान मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं। स्वागत वक्तव्य अवध प्रांत के महामंत्री डॉ. बलजीत श्रीवास्तव ने दिया, जबकि संचालन प्रदेश प्रचार प्रमुख एवं कार्यक्रम संयोजक अविनाश चंद्र मिश्र ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वाणी वंदना से हुआ। इसके बाद परिषद गीत प्रस्तुत किया गया। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर ‘साहित्य परिक्रमा’ के नूतन कलेवर का विमोचन किया।

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ने कहा कि साहित्य का महत्व किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान समय तक साहित्य ने समाज में चेतना जागृत करने, राष्ट्रीय भावबोध को मजबूत करने और महत्वपूर्ण विषयों पर विमर्श को दिशा देने का कार्य किया है। साहित्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना के निर्माण का प्रभावी माध्यम है।

मुख्य अतिथि प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समाज में वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम हैं। ‘साहित्य परिक्रमा’ का साहित्यिक और बुद्धिजीवी वर्ग में महत्वपूर्ण स्थान है। नियमित प्रकाशन से साहित्यिक संवाद को निरंतरता मिलेगी और देशभर के रचनाकारों एवं पाठकों को साझा मंच प्राप्त होगा।

मुख्य वक्ता एवं प्रबंध संपादक प्रो. डॉ. रजनीमान ने पत्रिका के नए स्वरूप और भावी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पाठकों की बढ़ती रुचि को ध्यान में रखते हुए पत्रिका के पृष्ठ-संयोजन, आवरण और प्रस्तुति में आवश्यक बदलाव किए गए हैं। पत्रिका को नियमित रूप से समय पर पाठकों तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ‘साहित्य परिक्रमा’ का प्रकाशन दिल्ली के साथ देश के विभिन्न राज्यों से भी किए जाने की योजना है।

उन्होंने कहा कि पत्रिका में लोकभाषा, लोककला, लोकसाहित्य, इतिहास और भारतीय संस्कृति को प्रमुखता दी जाएगी। आगामी अंकों में लोकभाषाओं, इतिहास और साहित्य के अंतर्संबंधों पर विशेष सामग्री प्रकाशित की जाएगी। भारतीय भाषाओं और संस्कृति को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से देश के अनेक साहित्यकार पत्रिका से जुड़कर कार्य कर रहे हैं।

परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य और युवा शक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है। युवाओं को साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। साहित्य नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकता है।

अवध प्रांत के महामंत्री डॉ. बलजीत श्रीवास्तव ने कहा कि ‘साहित्य परिक्रमा’ का नूतन कलेवर केवल बाहरी स्वरूप में बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, लोकभाषाओं और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक स्तर पर जोड़ने की पहल है। उन्होंने अवध की समृद्ध साहित्यिक और लोक परंपरा को देश के व्यापक साहित्यिक विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

अवध प्रांत के अध्यक्ष विजय त्रिपाठी ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं किसी भी साहित्यिक आंदोलन की वैचारिक आधारभूमि तैयार करती हैं। ‘साहित्य परिक्रमा’ के नए कलेवर में भारतीय भाषाओं, लोकसाहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रमुखता मिलना महत्वपूर्ण है।

विशिष्ट अतिथि डॉ. संजीव अवस्थी ने पत्रिका के नए कलेवर के विमोचन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसके नियमित प्रकाशन और व्यापक प्रसार के लिए शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम में डॉ. रमेश नैलवाल, प्रो. नीतू शर्मा सहित अनेक साहित्यकारों एवं विद्वानों ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर कृष्ण बिहारी लाल श्रीवास्तव, पद्मनाथ पाण्डेय, अमित मल्ल, प्रो. अंबिका तिवारी, सर्वेश पाण्डेय, मानस मुकुल, निर्भय गुप्ता, अनिल दुबे, शिवशंकर अवस्थी, डॉ. रीतेश दुबे, सुरेंद्र पाण्डेय, पत्रकार रमाशंकर शुक्ल, आनंद मिश्र सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, भाषाविद्, इतिहासकार, समाजसेवी और साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में अतिथियों और उपस्थित साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। वंदे मातरम् एवं राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का गरिमापूर्ण समापन हुआ।

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