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उपराष्ट्रपति का चुनाव 2025 : दक्षिण बनाम दक्षिण के साथ
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तमिलनाडु 2026 विधान सभा चुनाव के लिए बीजेपी का दांव
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हिन्दी भाषी राज्यों की छवि से बाहर निकलना
अभिषेक रंजन, स्वतंत्र पत्रकार
लखनऊ। भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव दक्षिण बनाम दक्षिण के साथ ही भाजपा और कांग्रेस की क्षेत्रीय अस्मिता पर बन आया है। इस चुनाव में भाजपा ने तमिलनाडु के कोयंबटुर के चंद्रपुरम पोन्नुसामी (सी पी) राधाकृष्णन को तो कांग्रेस ने तेलंगाना के रंगारेडडी जिले के रहने वाले पूर्व न्यायाधीष बी सुदर्षन रेडडी को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। यह जिला पहले आंध्रप्रदेष में आता था। राधाकृष्णन पिछड़ी तो सुदर्षन सामान्य जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा इस चुनाव के जरिए यह संदेष देना चाहती है कि भाजपा हिन्दी भाषी राज्य की ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत राज्य की भी पार्टी है। बीजेपी अगले साल तमिलनाडु में होने वाले विधान सभा चुनाव में जातिगत आधार पर अपने पांव मजबूत करना चाहती है। क्योंकि एआईडीएमके और बीजेपी कई साल से तमिलनाडु में अपने पैर जमाने की कोषिष कर रहे हैं लेकिन कामयाब नहीं हो पाएं हैं। बीजेपी ने तमिलियन के बीच अपनी पैठ को बढ़ाने के लिए ही आरएसएस के राधाकृष्णन को प्रत्याषी बनाया है। इससे पहले पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ कांग्रेस से भाजपा में आए थो जबकि राधाकृष्णन संघ से ही जुड़े रहे हैं। इस बार बीजेपी ने अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ता से सांसद बने राधाकृष्णन पर भरोसा किया है। बीजेपी को चुनाव प्रचार में यह कहने का मौका मिलेगा कि कंगे्रस और दªविण मिलकर एक तमिलियन व पिछड़ी जाति के प्रत्याषी का विरोध कर रही है। कांग्रेस ने सुदर्षन रेडडी के जरिए तेलंगाना और आंध्र प्रदेष में जातिगत क्षेत्रीय संतुलन को साधने की कोषिष की है।
सीपी राधाकृष्णन बीजेपी के पूर्व वरिष्ठ नेता हैं और लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहे हैं। राधाकृष्णन कोयंबटुर से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और पार्टी की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पद पर भी कार्य कर चुके हैं। राधकृष्णन ने यहां से दो बार 1998 और 1999 में जीत हासिल की लेकिन उसके बाद उन्हें 2004, 2014 और 2019 में लगातार तीन बार कोयंबटूर से हार का सामना करना पड़ा। फरवरी 2023 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। झारखंड के राज्यपाल रहते हुए उन्हें तेलंगाना के राज्यपाल और पुदुच्चेरी के उप राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा गया था। इसके बाद जुलाई 2024 में वे महाराष्ट्र के राज्यपाल बने।
बीजेपी ने उपराष्ट्रपति पद के लिए राधाकृष्णन चयन न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु, में बीजेपी की स्थिति को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है। राधाकृष्णन के चयन के माध्यम से दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु, को राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान देने का संदेश दिया है। तमिलनाडु में बीजेपी की स्थिति अभी तक कमजोर रही है। 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह चयन तमिल समाज को यह विश्वास दिलाने का प्रयास है कि बीजेपी उनकी क्षेत्रीय पहचान का सम्मान करती है। राधाकृष्णन तमिलनाडु के तिरुप्पुर से हैं और कोयंबटूर से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। उनकी उम्मीदवारी तमिलनाडु में बीजेपी की स्वीकार्यता बढ़ाने और क्षेत्रीय दलों जैसे डीएमके और एआईएडीएमके के प्रभुत्व को चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश के तहत यह चयन महाराष्ट्र में तमिल समुदाय को भी आकर्षित कर सकता है। तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के लिए राधाकृष्णन का विरोध करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि वह तमिलनाडु के एक सम्मानित नेता हैं। राधाकृष्णन ओबीसी समुदाय से आते हैं जो तमिलनाडु में लगभग 50 प्रषित आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। बीजेपी ने उनके चयन के माध्यम से तमिलनाडु के ओबीसी वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति अपनाई तमिलनाडु में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलै भी इसी समुदाय से हैं। अन्नामलै को हटाए जाने के बाद इस समुदाय में बीजेपी के प्रति असंतोष था जिसे राधाकृष्णन की उम्मीदवारी से साधने की कोशिश की गई है। बीजेपी ने सामाजिक समावेश के अपने एजेंडे को मजबूत करने के लिए राधाकृष्णन जैसे ओबीसी नेता को चुना है। राष्ट्रपति के रूप में आदिवासी समुदाय से द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री के रूप में ओबीसी समुदाय से नरेंद्र मोदी, और अब उपराष्ट्रपति के लिए ओबीसी नेता का चयन सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने का हिस्सा है। यह 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राधाकृष्णन की उम्मीदवारी को तमिलनाडु के लिए गर्व का क्षण बताया गया है। बीजेपी इसे तमिल पहचान और राष्ट्रीय एकता को जोड़ने के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है जिससे क्षेत्रीय दलों के तमिल कार्ड को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। 20 अक्तूबर 1957 को तमिलनाडु के तिरुप्पुर में जन्मे सी पी राधाकृष्णन ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक के रूप में शुरुआत करके वे 1974 में भारतीय जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने। 1996 में उन्हें तमिलनाडु में बीजेपी का सचिव नियुक्त किया गया। 2020 से 2022 तक राधाकृष्णन बीजेपी के केरल प्रभारी थे। बी सुदर्शन रेड्डी का जन्म 8 जुलाई 1946 को रंगारेड्डी जिले के तत्कालीन इब्राहिमपटनम तालुका के अकुला मायलाराम गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने 1971 में हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री हासिल की और आंध्र प्रदेश बार काउंसिल में एक वकील के रूप में नामांकन कराया। इसके बाद आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में रिट और सिविल मामलों में प्रैक्टिस की। 1995 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने। 2005 में उन्हें गुवाहाटी हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया। 2007 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने और 2011 में रिटायर हुए। मार्च 2013 में जस्टिस रेड्डी (रिटायर्ड) गोवा के पहले लोकायुक्त बने। हालांकि, कुछ महीने बाद सितंबर में उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफा दे दिया।
NAGARIK SATTA