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पीडीए की काट के लिए बीजेपी का चौधरी दांव
अभिषेक रंजन, स्वतंत्र पत्रकार
लखनऊ। राजनीति में मुददों की कभी कोई कमी नहीं होती और अगर मुददे जाति आधार पर हो तो सभी दल उसे लपकने का प्रयास करते हैं। यूपी और बिहार ऐसे दो प्रमुख राज्य हैं जहां जाति आधार पर राजनीति चरम पर होती है। भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, जदयू, राजद, लोजपा समेत कई दल हैं जो भले ही जाति से कोसों दूर रहने की बात करते हो लेकिन जाति है कि जाती ही नही ंके ढर्रे पर अपनी रणनीति बनाते हैं। सरकार में मंत्रिमंडल का विस्तार हो, टिकट बटवारा हो या फिर संगठन स्तर पर विभिन्न पदों पर तैनाती सभी में जाति को विषेष तव्वजों दी जाती है ताकि संबन्धित जाति की वोट बैंक की फसल को आसानी से काटा जा सके। इससे उस जाति को भी लाभ मिलता है। राजनीति में जाति के प्रयोग से उस जाति को भी सरकार और संगठन में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलता है। एक समय था जब कांगे्रस ने जाति-धर्म के नाम पर जमकर राजनीति की थी मौका अभी भी तलाष रही है लेकिन कांग्रेस को सफलता नहीं मिल पा रही है। हाल का उदाहरण देखे तो बिहार मेें कांग्रेस ने अपने सहयोगी दल राजद के साथ चुनाव लड़ा तो लेकिन बात नहीं बन पाई और पार्टी का प्रदर्षन निराषाजनक रहा। टिकट बटवारे को लेकर कांग्रेस ने विधानसभावार जाति को ही प्रमुखता दी थी। बीजेपी समेत सभी दलों ने भी यही फार्मूला अपनाया था।
ताजा मामला अब बीजेपी में दिखाई पड़ा है जहां पर कुमी बिरादरी से आने वाले सात बार के सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री पंकज चैधरी यूपी भाजपा के धुरंधर होंगे। केेंद्रीय नेतृत्व ने यह निर्णय सपा की पीडीए काट को लेकर किया है। क्योकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने सात कुर्मी बाहुल्य सीटों पर भाजपा को मात दी थी। अगले साल 2026 में पाँच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे। यह चुनाव मार्च से मई 2026 के बीच हो सकते हैं। इनमें असम में 126 सीटों के लिए, केरल में 140, तमिलनाडु में 234, पश्चिम बंगाल में 294, पुडुचेरी में 30 सीटों के लिए चुनाव होंगे। इसी प्रकार से 2027 में छह राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। यह चुनाव भी फरवरी-मार्च और नवंबर-दिसंबर 2027 के बीच होंगे, क्योंकि मौजूदा विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेष, गुजरात हैं। कांग्रेस, सपा, बसपा, समेत अन्य दल भी इन चुनाव को देखते हुए ही अपने संगठन में बदलाव कर सकते हैं।
पीडीए की काट को लेकर बीजेपी ने कुर्मी बिरादरी के चेहरे को प्रमुखता दी है क्योंकि सात लोकसभा सीटे कुर्मी बाहुल्य की सपा के खाते में गई है। यूं तो पार्टी में पहले से ही कई बड़े ओबीसी चेहरे हैं पर पंकज पर दांव लगाकर बीजेपी ने नया तीर चलाया है। पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व में इनकी अच्छी पकड़ और सबके लिए उपलब्ध होने वाले नेता की छवि के कारण इस पद के लिए दावेदार अन्य नेताओं की तुलना में उन्हें ज्यादा मजबूत चेहरा माना जा रहा है। इसके अलावा पीएम मोदी और अमित शाह के करीबी होने के नाते केंद्रीय नेतृत्व को पंकज पर पूरा यकीन है कि वह केंद्र और राज्य में बेहतर तालमेल बिठा पाएंगे। एक साल बाद ही यूपी में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। पंकज चैधरी के जरिए पार्टी ने ओबीसी बिरादरी में साफ संदेष दिया है ताकि नाराज और छिटके ओबीसी समुदाय भाजपा की तरफ आकर्षित हो सके। लोकसभा चुनाव में यूपी में पार्टी के खराब प्रदर्शन के पीछे सपा के पीडीए का दांव सफल होना माना जाता है। ऐसे में अगले चुनाव में भाजपा पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में फिर से अपनी पकड़ वापस पाना चाहती है। इसके लिए पंकज चैधरी पार्टी के मिशन-2027 में फायदेमंद हो सकता है। पिछड़े समाज में इनकी मजबूत पकड़ के अलावा संगठन में इनको लेकर कभी गतिरोध सामने नहीं आया। सात बार सांसद होने के बाद भी जनता से इनकी नजदीकी कम नहीं हुई। संघ से इनकी नजदीकी के साथ ही पार्टी के कैडर वाले नेताओं के भी प्रिय माने जाते हैं। पिछड़े समाज के काफी मजबूत नेता माने जाते हैं।
गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी समारोह में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कार्यक्रम और प्रोटोकॉल को तोड़कर पंकज चैधरी के घर जाकर उनका कद बढ़ाया था। उनके घर जाने के लिए पीएम मोदी को संकरी गलियों से पैदल जाना पड़ा था। पीएम मोदी की इस तवज्जो ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में पंकज का कद बढ़ा दिया और कुर्मी बिरादरी में उनकी पकड़ और मजबूत हो गई। 15 नवंबर 1964 को जन्मे गोरखपुर के उद्योगपति स्वर्गीय भगवती चैधरी एवं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उज्ज्वल चैधरी के छोटे सुपुत्र पंकज चैधरी ने गोरखपुर नगर निगम के पार्षद के तौर पर 1989 में राजनीति का सफर शुरू किया। वर्ष 1990 में ही भारतीय जनता पार्टी की जिला कार्य समिति सदस्य हुए। 10वीं लोकसभा में वर्ष 1991 में महराजगंज संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर सांसद चुने गए। 11 वीं और 12 वीं लोकसभा में वर्ष 1996, 1998 में सांसद चुने गए। 1999 में सपा के अखिलेश से हार मिली पर 2004 में फिर निर्वाचित हुए। 2009 में कांग्रेस के स्वर्गीय हर्षवर्धन से हार मिली। 2014 से लगातार लोकसभा के सदस्य हैं। यूपी के राजनीतिक परिदृश्य में यह एक केंद्रीय कारक रहा है जहां पारंपरिक रूप से ब्राह्मण, ठाकुर, यादव और जाटव जैसी प्रमुख जातियां महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव रखती हैं। सपा और बसपा विशिष्ट जाति समूहों के वोट बैंक पर निर्भर रहे हैं। सपा का आधार विशेषकर यादव और बसपा का जाटव समाज से है। विभिन्न राजनीतिक दल भी टिकट वितरण में भी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में बहुसंख्यक जाति के आधार पर अपने उम्मीदवार का चयन करती हैं ताकि जीत सुनिश्चित की जा सके। जातिगत राजनीति के आधार पर ही बीते कई सालों में यूपी में, कई छोटे, एकल-जाति-आधारित पार्टियों का उदय हुआ है। जिसमें अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी है जो अपने विशिष्ट समुदायों के बीच समर्थन रखती हैं और बड़ी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सरकार का हिस्सा बनती है।
NAGARIK SATTA