श्रीधर अग्निहोत्री
भारतीय राजनीति के विराट आकाश में कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी चमक समय के अंधकार में भी राह दिखाती है। लालकृष्ण आडवाणी उन्हीं में से एक हैं। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि विचार, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा के प्रतीक हैं। आज, जब वे अपनी जीवन-यात्रा के अठानवेवें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, उनका पूरा जीवन भारतीय राजनीति में त्याग, अनुशासन और समर्पण का अप्रतिम उदाहरण बन चुका है।
8 नवंबर 1927 को अविभाजित भारत के कराची में जन्मे आडवाणी जी ने किशोरावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। विभाजन की त्रासदी से गुजरने के बावजूद उन्होंने कभी कड़वाहट को जीवन का हिस्सा नहीं बनने दिया। बल्कि उस पीड़ा को उन्होंने भारत माता की सेवा का संकल्प बना लिया। शिक्षक के रूप में करियर शुरू कर पत्रकारिता तक पहुंचे, और ‘ऑर्गेनाइज़र’ पत्र से जुड़कर विचारों की साधना करते रहे। यही साधना आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक कलेवर में ढल गई।
आडवाणी जी ने जिस प्रकार पार्टी को फर्श से अर्श तक पहुँचाया, वह आधुनिक भारत की राजनीतिक यात्रा का अद्भुत अध्याय है। सोमनाथ से अयोध्या तक निकली उनकी राम रथयात्रा ने न केवल भाजपा को जन-जन की पार्टी बनाया, बल्कि देश की राजनीतिक धारा को नई दिशा दी। “जय श्रीराम” का नारा केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं था, वह सांस्कृतिक जागरण की पुकार थी, और उस जागरण के सारथी थे आडवाणी।
उनका जीवन जितना संघर्षशील रहा, उतना ही सादगीपूर्ण भी। 1975 के आपातकाल में जेल गए तो वह उनकी विचारनिष्ठा की कसौटी थी। जेल से लौटकर उन्होंने जनसंघ और बाद में भाजपा को संगठित स्वरूप दिया। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनका रिश्ता राजनीति की साझेदारी से आगे बढ़कर आदर्श मित्रता का रूप था। एक कवि-हृदय नेता और एक दृढ़ विचारक, इन दोनों ने मिलकर भारतीय राजनीति को लोकतांत्रिक आदर्शों की नई परिभाषा दी।
गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में आडवाणी जी ने राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ किया। आतंकवाद, अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका दृढ़ संकल्प आज भी नीति-निर्माताओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने राजनीतिक विचार को आचरण में रूपांतरित किया, और यही उन्हें सामान्य राजनेताओं से ऊपर उठाकर राष्ट्रपुरुष की श्रेणी में लाता है।
2024 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की घोषणा की, तो वह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक विचारधारा के अडिग प्रहरी का सम्मान था। आडवाणी जी के जीवन का हर अध्याय भारतीय राजनीति के संस्कारों की नई परिभाषा गढ़ता है- अनुशासन, निष्ठा और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण।
आज उनके जन्मदिन पर संपूर्ण राष्ट्र उस रथयात्री को नमन करता है, जिसने राजनीति को सत्ता का नहीं, साधना का माध्यम बनाया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि विचारों में दृढ़ता और व्यवहार में विनम्रता, यही सच्चा नेतृत्व है।
NAGARIK SATTA